Wednesday, May 1, 2019



चीन पर पड़े अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण उसकी हठ-धर्मिता को झुकना पड़ा और यूएन ने कुख्यात आतंकी मसूद अजहर को 'ग्लोबल टेररिस्ट' घोषित कर दिया।इसे भारत की कूटनीतिक विजय ही माना जाएगा। कुछ मित्रों का कहना है कि मसूद को बीजेपी की सरकार ने ही तो आतंकियों को सौंप दिया था आदि। 

दरअसल,24 दिसंबर 1999 को 5 हथियारबंद आतंकवादियों ने 178 यात्रियों के साथ इंडियन एयरलाइंस के हवाई जहाज आईसी-814 को हाइजैक कर लिया था। हरकत-उल-मुजाहिद्दीन के आतंकियों ने भारत सरकार के सामने 178 यात्रियों की जान के बदले में तीन आतंकियों की रिहाई का सौदा किया था। भारत सरकार ने यात्रियों की जान बचाने के लिए जिन तीन आतंकियों को छोड़ने का फैसला किया था, उनमें से मसूद अजहर भी एक था। 

देखा जाय तो उस समय जो भी सरकार होती,शायद वही करती जो उस समय की सरकार ने किया।कल्पना कीजिये, यात्रियों की जान खतरे में हो।एक यात्री का चेतावनी के तौर पर गला भी रेत दिया जाय।तो सरकार क्या करती? इस प्रसंग में उस समय विमान की हालत पर एक अधिकारी का यह बयान पठनीय है : ''जब हम विमान में घुसे तो चारों तरफ मल और पेशाब फैला था, क्योंकि सप्ताह भर से यात्री कहीं नहीं गए थे।सबकी हालत बुरी थी और आतंकियों द्वारा रुपिन कात्याल की हत्या के बाद हुए झगड़े में कुछ यात्री घायल भी हो गए थे।तीन आतंकियों के बदले दो सौ के करीब यात्रियों की जान की सुरक्षा का सवाल था।यों,वीपी सिंह के शासनकाल में भी गृहमंत्री मुफ़्ती सैयद की बेटी रूबिया को कुछेक आतंकियों के बदले छोड़ना पड़ा था।ऐसे संवेदनशील और तनावपूर्ण क्षणों में सरकार को बहुत सोच-समझ कर जनहित अथवा देशहित में निर्णय लेने पड़ते हैं। दिल पर हाथ रखकर सोचें: संयोग से अगर हमारा भी कोई रिश्तेदार: भाई,पत्नी,बेटा,बाप,बहन या माता इस जहाज़ में होते तो हमारा रवैया क्या होता?क्या हम अपनों को किसी भी मूल्य पर छुड़ाने की गुहार नहीं लगाते?या फिर अपने बाप/बेटे/पत्नी आदि को मरने दे देते!आतंकियों अथवा फिरौती मांगने वालों को तो हम देर-सवेर दबोच लेते मग़र खुदा-न-खास्ता अगर वे दरिन्दे आतंकी यात्रियों की एक-एक कर के हत्या कर देते तो उनकी मूल्यवान ज़िन्दगियों को हम वापस कहाँ से ले आते?इसलिए उस समय का सरकार का निर्णय सर्वथा समयोचित ही नहीं,कूटनीतिक भी था। 

शिबन कृष्ण रैणा 

अलवर

Thursday, April 25, 2019


यासीन मलिक 
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती जेकेएलएफ के अलगाववादी नेता यासीन मलिक की जेल से रिहाई के लिए गुहार लगा रही है।(शायद धरने पर भी बैठी है।)यह वही अलगाववादी नेता यासीन मलिक है जिसपर 25 जनवरी 1990 में भारतीय वायुसेना कर्मियों पर आतंकी हमले में शामिल होने का आरोप है। इस हमले में वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना सहित चार वायुसेना कर्मियों की मौत हो गई थी, जबकि 10 वायुसेना कर्मी जख्मी हो गए थे।और भी कई संगीन आरोप हैं इस अलगाववादी मलिक पर।गौरतलब है कि जेकेएलएफ 1988 से घाटी में सक्रिय है और कई आतंकी गतिविधियों में शामिल रहा है. संगठन ने 1994 में हिंसा का रास्ता छोड़ने का दावा किया लेकिन अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा.माना जाता है कि इस संगठन का मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया के अपहरण में भी हाथ रहा है. इस घटना को दिसंबर 1989 में अंजाम दिया गया था. तब मुफ्ती मोहम्मद देश के तत्कालीन गृहमंत्री थे. माना यह भी जा रहा है कि यासीन मलिक ही 1989 में घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन का मास्टर- माइंड था और यही पंडितों के नरसंहार के लिए जिम्मेदार था. 

गौरतलब है कि यासीन मलिक पर कश्मीरी अलगाववादियों और आतंकी समूहों की वित्तीय मदद करने के आरोप में बीते दिनों उन्हें राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने गिरफ्तार किया था.उनकी गिरफ्तारी के बाद पहले उन्हें जम्मू की कोट भलवाल जेल में रखा गया था लेकिन उसके बाद उन्हें दिल्ली की तिहाड़ जेल में भेज दिया गया था. जेकेएलएफ पर आतंकी गतिविधियों को समर्थन देने का आरोप लगता रहा है। यासीन मलिक पर आरोप है कि 1994 से भारत विरोधी गति‍विधियां चलाते थे। वह देश के पासपोर्ट पर पाकिस्‍तान जाते और वहां पर देश विरोधी गतिविधि‍यों में लिप्‍त रहते थे। पिछले दिनों पुलवामा हमले के बाद केंद्र सरकार ने यासीन मलिक समेत सभी अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस ले ली थी। अब एक बड़ा कदम उठाते हुए मोदी सरकार ने जेकेएलएफ को बैन कर दिया है। 

प्रवर्तन निदेशालय भी लेगा ऐक्‍शन 
दूसरी ओर, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भी फेमा अधिनियम का उल्‍लंघन करने के मामले में यासीन मलिक के खिलाफ कानूनी कार्यवाही में जुटा हुआ है। यासीन मलिक पर अवैध रूप से 10 हजार अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा रखने का आरोप है। इस मामले में शुक्रवार को ही ईडी ने एक और अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी पर 14.40 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। 

यासीन मलिक खुद स्‍वीकार कर चुका है कि उसने 1987 में 4 भारतीय सुरक्षाकर्मियों की हत्‍या कर दी थी। इस दोष में उसे सजा भी काटनी पड़ी थी। यासीन मलिक 1999 और 2002 में गिरफ्तार हो चुका है। 2002 में तो उसे पोटा के तहत गिरफ्तार किया गया था। यासीन मलिक पर लगातार पाकिस्‍तानी आतंकियों के साथ संबंध रखने के आरोप लगते रहे हैं। 1990 में हिंदुओं का कत्लेआमकर उन्हें कश्मीर से बेदखल करने के आंदोलन में यासीन जैसे नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
यासीन मलिक पर पहले से पाकिस्‍तान के आतंकी संगठनों के साथ संबंधों के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन भारत सरकार उसकी गतिविधियों को वोट बैंक की राजनीति के चलते उसकी हरकतों को नजरअंदाज करती रही है। इसी का परिणाम यह है कि उसके जैसे नेताओं के हौसले बुलंद होते गए। आज वह खुलेआम पाकिस्तना की गोद में बैठ गया है। 

"जेकेएलएफ जम्मू कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियों में सबसे आगे है, वह 1989 में कश्मीरी पंडितों की हत्याओं के लिए जिम्मेदार रहा है, जिसकी वजह से उन्हें राज्य से बाहर पलायन करना पड़ा." 

ऐसे विध्वंसकारी के बचाव में वही उतरेगा जिसकी अलगाववादियों के साथ सहानुभूति ही नहीं,सांठगांठ भी हो।अन्यथा महबूबा को बयान देना चाहिए था कि ज्यूडिशरी अपना काम कर रही है।जो फैसला आएगा वह सर माथे। 



14 फरवरी को हुए आतंकी हमले के बाद जम्मू एवं कश्मीर सरकार ने कई अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस ले ली थी जिसमें मलिक, सैयद अली शाह गिलानी, शब्बीर शाह और सलीम गिलानी शामिल हैं. 

Friday, February 22, 2019



पछतावा


हमारे पड़ोस में रहने वाले आनंदीलाल जी सत्तर के करीब होंगे। काया दुर्बल है, अत: चलने-फिरने में दिक्कत महसूस करते हैं। सुबह-सुबह जब मैं बच्चों के साथ अपने प्रांगण में बैड-मिंटन खेलता हूँ तो वे मुझे धीमी चाल से चहल-कदमी करते हुए दिखाई पड़ते है। सिर झुकाए तथा वितृष्ण नजरों को इधर-उधर घुमाते हुए वे भारी कदमों से मेरे सामने से निकलते हैं। क्षण-भर के लिए वे मुझ पर नजऱें गड़ाते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। उनकी छोटी-छोटी आँखों में मुझे अवसाद की गहरी परतें जमी हुई नजर आती हैं। मैं सोचता हूँ कि शायद मंदिर जा रहे होंगे, किन्तु मंदिर के फाटक तक पहुँच जाने के बाद वे वापस मुड़ जाते हैं। मुझे वे ऐसे घूरते हैं मानो मैं कोई अपराधी होऊँ। उनकी तरफ देखकर मुझे ऐसा लगता है जैसे फटकार लगाकर मुझे कुछ कहना चाहते हों-

''काल की चाल को कौन थाम सका है भाई? योगी भी नहीं, महात्मा भी नहीं। अब भी वक्त है, चेत जा बाबू, चेत जा।“

उनकी नजरों की फटकार से बचने के लिए मैं अक्सर अपनी गर्दन मोड़ लेता हूँ और बच्चों के साथ खेल में लग जाता हूँ। आगे बढऩे के बाद वे एक बार फिर पीछे मुड़कर देखने लगते हैं, शायद यह जानने के लिए कि मैं भी उन्हें देख रहा हूँ कि नहीं।

हमारा यह मौन-संभाषण तब से चला आ रहा है जब से मैं और आनंदीलाल जी इस आवासीय कॉलोनी में रहने लगे हैं। हमारी ही लाइन में सात-आठ मकान पीछे उनका मकान है। एक दिन की बात है- आनंदीलाल जी अपनी दिनचर्या के मुताबिक मेरे मकान के सामने से निकले। दिनचर्या के तुमाबिक ही उन्होंने मेरे ऊपर नजऱें गड़ाई। उस दिन जाने ऐसा क्या हुआ कि वे देर तक मुझे देखते रहे। मैने भी नजरें हटाई नहीं बल्कि आँखों ही आँखों में उनको आदरभाव के साथ अभिवादन पेश किया। मुझे लगा कि मेरे इस अभिवादन को पाने की शायद वे बहुत दिनों से प्रतीक्षा कर रहे थे। क्षण-भर में अपरिचय, संकोच और औपचारिकता की सारी दीवारें जैसे ढह गईं। हाथ के इशारे से उन्होंने मुझे अपनी ओर बुलाया। मैं चाहता तो उनके पास नहीं जाता, मगर मुझे लगा कि वे मुझे कुछ कहना चाहते हैं। शायद कई दिनों से वे इस अवसर की तलाश में थे। मैं सड़क पार कर उनके पास पहुँचा। हाथ जोड़कर मैंने नमस्ते की। उन्होंने मेरे कन्धे पर अपना दायां हाथ रखा, जिसका मतलब था कि वे मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। इस बीच मेंने अनुभव किया कि उनकी छोटी-छोटी आँखों में अश्रु-कण तैरने लगे हैं। सांस उनकी फूली हुई है तथा टाँगें लरज रही हैं। इससे पहले कि मैं कुछ कहता, वे बोल पड़े-

'तुम मास्टर हो, बच्चों को पढ़ाते हो ना?’

'हाँ-हाँ, लडकों को पढ़ाता हूँ। कॉलेज का प्रोफेस र हूँ।‘मैंने बड़ी शालीनता से निवेदन किया।

मेरी बात सुनकर जैसे उनकी वाणी खुल-सी गई।

दूसरा हाथ भी मेरे कन्धे पर रखकर वे बोले-

'प्रोफेसर साहब, अब भी वक्त है। चेत जाओ, चेत जाओ...’

मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया कि आनंदीलाल जी कहना क्या चाहते हैं। मैंने अन्दाज लगाने की खूब कोशिश की, किन्तु नाकामयाबी ही हाथ लगी। मेरी उलझन को वे भांप गये, बोले-

'घर आ जाओ कभी, सारी उलझन दूर हो जाएगी...।‘

मुझे लगा कि मैं पकड़ा जा रहा हूँ और मेरी ज्ञान-गरिमा चकना-चूर होती जा रही है। मैं मन-ही-मन इस बूढ़े आदमी की आत्मविश्वास एवं जीवन-सार से भरी हुई बातों की प्रशंसा करने लगा। क्या मनोवैज्ञानिक दृष्टि है ! क्या आत्म-बल है ! ....कहीं ऐसा तो नहीं कि जीवन के निचोड़ से निकले किसी बहुमूल्य रहस्य अथवा तथ्य को यह शख्स मुझे बताना चाहता हो। पर मुझे ही क्यों,....कॉलोनी में और भी तो इतने सारे लोग रहते हैं। मेरी चुप्पी उन्होंने तोड़ी, बोले-

'कोई मजबूरी नहीं है। मर्जी हो तो आ जाना। तुम्हारे लेख मैं अखबार में पढ़ता रहूता हूँ’ यह कहकर वे हल्की-सी मुझकराहट के साथ आगे बढ़ गए। उनके आखिरी वाक्य ने मुझे भीतर तक गुदगुदा दिया। मेरे अनुवादों और कहानियों को यह आदमी अपनी भाषा में लेख कहता है। कोई बात नहीं। पढ़ता तो है। पड़ोसी होने के रिश्ते को लेखक-पाठक के रिश्ते ने और बल प्रदान किया। मैं उसी दिन शाम के वक्त आनंदीलाल जी के घर चला गया। दरवाजा उन्होंने ही खोला। हल्की-सी मुस्कराहट के साथ उन्होंने मेरा स्वागत किया। हम दोनों आमने-सामने बैठ गए। काफी देर तक वे मुझे देखते रहे और मैं उन्हें। बीच-बीच में वे मामूली-सा मुस्करा भी देते। मौन-संभाषण जारी था। वे मुझे क्या चेताना चाह रहे थे, यह मैं आज जानना चाहता था। इस बीच मैंने महसूस किया कि वे बड़े सहज भाव से मेरी हर गतिविधि का अपनी अनुभवी नजरों से बड़ी गहराई के साथ अध्ययन कर रहे हैं। मुझे अपने मित्त-भाषी स्वभाव पर दया आई। आनंदीलाल जी अब भी संयत-भाव से मुझे तके जा रहे थे और मंद-मंद मुस्कराए जा रहे थे। तभी उनकी श्रीमती जी ने प्रवेश किया। पानी के दो गिलास हमारे सामने रखकर वह भीतर चली गई। जाते-जाते उसने अपने पति को कुछ इस तरह से घूर कर देखा मानो कह रही हो कि मुझे चाय बनाने के लिए मत कहना, मुझ में अब वह ताकत नहीं रही।

पानी पीकर गिलास को जैसे ही मैंने नीचे रखा, आनंदीलाल जी बोल पड़े-

'मन्दिर का मतलब मालूम है ?’

'मैं कुछ सकपकाया। अचानक ऐसा सवाल उन्होंने दे मारा था मुझ पर कि मैं सकते में आ गया। शब्दों को जमाते हुए मैंने कहा-

'जहाँ भगवान की मूर्ति रहती है, जहाँ भक्तजन पूजा-अर्चना करते हैं, वह पवित्र-स्थान मन्दिर कहलाता है।‘

'न-न, यह सही उत्तर नहीं है’ वे ऐसे बोले मानो मेरी प्रोफेसरी का बल निकालने पर तुले हुए हों ।

‘तो फिर ?’ मैंने पूछा।

'मन के अन्दर जो रहे, वह मन्दिर।‘ कहकर वे हल्का-सा हंस दिए।

मन्दिर की यह परिभाषा सुनकर मेरे विस्मय की सीमा नहीं रही। सचमुच, इस परिभाषा में दम था। वे एक बार फिर मुस्करा दिए मुझे देखकर, शायद यह सोचकर कि उन्होंने मुझे भिड़ते ही चित कर दिया था। मैंने पाया कि उनके चेहरे पर विजयोल्लास झलक रहा था। मेरी बेचैनी बढ़ गई। सोचने लगा कि यदि इन्होंने और कोई ऐसा ही निरुत्तर करने वाला प्रश्न ठोंक दिया तो मेरी प्रतिष्ठा खतरे में पड़ सकती है। मैंने विनत होकर पूछा-

'वह आप चेत जाने की बात कह रहे थे ना।‘

'हां-हां कह रहा था, मगर पहले मेरे एक और प्रश्न का जवाब दो।‘

मैं आनंदीलाल जी की तरफ जिज्ञासाभरी नजरों से देखने लगा। मुझे लगा कि वे इस वक्त सचमुच यक्ष बने हुए हैं।

'यह बताओ जीवन में गहन पछतावा कब होता है ?’

प्रश्न कोई कठिन नहीं था। मैंने तत्काल उत्तर दिया-

'गलत काम करने पर पछतावा होता है।‘

'नहीं, इस बार भी तुम सही जवाब नहीं दे सके।‘

'तो सही जवाब क्या है ?’ मैंने झुंझलाते हुए कहा।

उन्होंने लम्बी-गहरी सांस ली। इधर-उधर नजरें घुमाई और कहने लगे-

'ममता किसी से मत रखो, अपनी संतान से भी नहीं। नहीं तो बुढ़ापे में पछताओगे। मैं तो पछता रहा हूँ। तुम चेत जाओ।‘

आनंदीलाल जी अब इस संसार में नहीं रहे। उनकी धर्मपत्नी का भी पिछले महीने स्वर्गवास हो गया। मैंने आनंदीलाल जी के अतीत को जानने की कोशिश की तो मालूम पड़ा कि अपने समय के प्रतिष्ठित व्यापारियों में उनकी गणना थी। अपनी लगन और मेहनत से उन्होंने पुस्तक-प्रकाशन का कारोबार जमाया था। जब बच्चे बड़े हो गए तो उनको अपना कारोबार संभलाकर खुद चालीस वर्षों की थाकन को उतारने की गर्ज़ से घर पर रहने लगे। लड़कों की शादियाँ हुई, घर-गृहस्थी नए आयाम और नए विस्तार लेती गई। कारोबार भी फैलता गया और एक दिन नौबत यह आ गई कि कारोबार का बंटवारा हो गया। तीनों लड़के अलग हो गए और अलग-अलग रहने लगे। आनंदीलाल जी और उनकी पत्नी इस संसार में अकेले रह गए और उनके साथ रह गई उनके अतीत की यादें, जिन यादों को अपने सीने में संजोए जाने कितनी रातें उन्होंने करवटें बदल-बदल कर काटी होंगी, इसका अनुमान मैं अच्छी तरह लगा सकता हॅँ।

Monday, January 21, 2019



लगभग उन्नतीस साल हो गए हैं कश्मीरी पंडितों को बेघर हुए। इनके बेघर होने पर आज तक न तो कोई जांच-आयोग बैठा, न कोई स्टिंग आपरेशन हुआ और न संसद या संसद के बाहर इनकी त्रासद-स्थिति पर कोई सार्थक बहसबाजी ही हुई। इसके विपरीत ‘आजादी चाहने’ वाले अलगाववादियों और जिहादियों/जुनूनियों को सत्ता-पक्ष और मानवाधिकार के सरपरस्तों ने हमेशा सहानुभूति की नजर से देखा। पहले भी यही हो रहा था और आज भी यही हो रहा है। सर्वोच्च न्यायलय ने भी पंडितों की उस याचिका पर विचार करने से मना कर दिया जिस में पंडितों पर हुए अत्याचारों की जांच करने के लिए गुहार लगाई गयी थी। ऐसे में दिल के किसी कोने से यह आवाज़ निकलना स्वाभाविक है कि "काश, अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की तरह कश्मीरी पंडितों का भी अपना कोई वोट-बैंक होता तो आज स्थिति दूसरी होती!" लगभग उन्नतीस सालों के विस्थापन की पीड़ा से आक्रांत/बदहाल यह जाति धीरे-धीरे अपनी पहचान और अस्मिता खो रही है। कौन जानता है आने वाले समय में उपनामों को छोड़ इस जाति की अपनी कोई पहचान बाकी रहेगी भी या नहीं!

आज कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडित नहीं के बराबर हैं। अगर हैं भी तो वे किसी मजबूरी के मारे वहां पर रह रहे हैं और उनकी संख्या नगण्य है। वादी से खदेड़े जाने के बाद ये लोग शरणार्थी शिविरों (जम्मू और दिल्ली में) या फिर देश के दूसरे स्थानों पर रह रहे हैं। माना जाता है कि 3 लाख के करीब कश्मीरी पंडित जिहादियों के जोर-जब्र की वजह से घाटी से भागने पर विवश हुए। कभी साधन-सम्पन्न रहे ये हिंदू/पंडित आज सामान्य आवश्यकताओं के मोहताज हैं। उन्हें उस दिन का इंतज़ार है जब वे ससम्मान अपने घर वापस जा सकें।

केंद्र और राज्य सरकारें पंडितों को कश्मीर में बसाने और कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए भरसक प्रयत्न कर रही हैं। कोशिश यह की जा रही है कि विभिन्न पक्षों के बीच वार्ता-संवाद से कोई समाधान निकाला जाए। जैसा कि होता है, ऐसे उलझे हुए मामलों में प्राय: सत्तारूढ़ दल अपनी पूर्ववर्ती सरकार पर दोषारोपण करते हुए कहता है कि समस्या हम पर थोपी गई है। समय रहते अगर पूर्ववर्ती सरकारों ने कड़े कदम उठाए होते और जिहादी-अलगाववादी गतिविधियों पर लगाम कसी होती तो आज कश्मीर में हालात इतने बिगड़े हुए न होते। कहने की आवश्यकता नहीं कि कश्मीर में जब-जब सरकार बदलती है, लगभग यही आरोप सरकारें एक-दूसरे पर लगाती आई हैं। सत्ता में रहने या सत्ता हासिल करने के लिए ये आरोप-प्रत्यारोप कश्मीर की राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं।

इसी तरह का एक आरोप 1990 में कश्मीर के हुक्मरानों ने गवर्नर जगमोहन पर लगाया था कि कश्मीर से पंडितों के विस्थापन में उनकी विशेष भूमिका रही है। हालांकि इस आक्षेप का न तो कोई प्रमाण था और न कोई दस्तावेज, मगर फिर भी इस आरोप को तब मीडिया ने खूब उछाला था। कहने का तात्पर्य यह है कि राजनीति में रहने के लिए, अपनी राजनीति चमकाने के लिए या फिर जैसे-तैसे खबरों में छाए रहने के लिए आरोप गढ़ना-मढ़ना अब हमारी राजनीति का चलन हो गया है। जिन्होंने जगमोहन की पुस्तक ‘माय फ्रोजेन टरबुलंस इन कश्मीर’ पढ़ी हो, वे बता सकते हैं कि कश्मीरी पंडित वादी से पलायन करने को क्यों मजबूर हुए थे। जगमोहन ने तो सीमित साधनों और विपरीत परिस्थितियों के चलते घाटी में विकराल रूप लेती आतंककारी घटनाओं को खूब रोकना चाहा था, मगर उस समय के स्थानीय प्रशासन और केंद्र की उदासीनता की वजह से स्थिति बिगड़ती चली गई थी। जब आतंकियों द्वारा निर्दोष पंडितों को मौत के घाट उतारने का सिलसिला बढ़ता चला गया तो जान बचाने का एक ही रास्ता रह गया था उनके पास और वह था घरबार छोड़कर भाग जाना।

दरअसल, किसी भी जाति के अस्तित्व के लिए तीन शर्तों का होना परमावश्यक है। पहली, उसका भौगोलिक आधार अर्थात उसकी अपनी सीमाएं, क्षेत्र या भूमि। दूसरी, उसकी सांस्कृतिक पहचान और तीसरी, अपनी भाषा और साहित्य। ये तीनों किसी भी ‘जाति’ के मूलभूत तत्त्व होते हैं। अमेरिका या इंग्लैंड में रह कर आप अपनी संस्कृति का गुणगान या संरक्षण तो कर सकते हैं, मगर वहां अपना भौगोलिक आधार तैयार नहीं कर सकते। यह आधार तैयार हो सकता है अपने ही देश में और ‘पनुन कश्मीर’ (अपना कश्मीर) की अवधारणा इस दिशा में उठाया गया सही कदम है। सारे विस्थापित/गैर-विस्थापित कश्मीरी पंडित जब एक ही जगह रहने लगेंगे तो भाषा की समस्या तो सुलझेगी ही, सदियों से चली आ रही कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की भी रक्षा होगी। लगता तो यह एक दूर का सपना है, मगर क्या मालूम यह सपना कभी सच भी हो जाए।

शिबन कृष्ण रैणा 

अरावली विहार,अलवर 



Friday, January 18, 2019


कश्मीरी पंडितों का काला दिवस १९ जनवरी,१९९० 


कश्मीरी पंडितों के घाटी से जबरन विस्थापन के लगभग उन्नती वर्ष 19 जनवरी,2019 को पूरे हुए।इस बीच न 'पनुन कश्मीर'(अपना कश्मीर)की अवधारणा साकार हुई और न पंडितों की घरवापसी का सपना पूरा हो सका।पण्डितों को वापस घाटी में बसाने की सरकार की पहल भी कोई रंग नहीं लाई।बदहाली से जूझते,अपने ज़ख्मों को सहलाते तथा कर्मनिष्ठ बन इस देशभक्त कौम ने इन उन्नतीस वर्षों के दौरान दुनिया को दिखा दिया कि प्रभु उनकी मदद करते हैं जो अपनी मदद खुद करते हैं।कश्मीरी पंडितों के मुद्दे को मात्र वोटों के लिए भुनाने की बात आहिस्ताआहिस्ता साफ होती जा रही है।कश्यप ऋषि की संतानें विपरीत परिस्थितियों में जीना खूब जानती है।यही इस देशप्रेमी समुदाय का सम्बल और सहारा है। यहाँ पर इस बात को रेकांकित करना लाजिमी है कि जब तक कश्मीरी पंडितों की व्यथा-कथा को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर नहीं किया जाता तब तक इस धर्म-परायण,कर्तव्यनिष्ठ और राष्टभक्त कौम की फरियाद को व्यापक समर्थन प्राप्त नहीं हो सकता।इस के लिए परमावश्यक है कि सरकार इस समुदाय के किसी जुझारू,कर्मनिष्ठ और सेवाभावी नेता को राज्यसभा में मनोनीत करे ताकि पंडितों के दुःखदर्द को देश तक पहुँचाने का उचित और प्रभावी माध्यम इस समुदाय को मिले।अन्य मंचों की तुलना में देश के सर्वोच्च मंच से उठाई गयी समस्याओं की तरफ जनता और सरकार का ध्यान तुरंत जाता है। 

यदि सरकार इस तरह का कोई निर्णय लेती है तो निश्चित ही कश्मीरी पंडित समुदाय की व्यथा-कथा को वाणी मिलेगी और पंडित समाज को लगेगा कि सरकार सच में उनकी हितैषी है और उनके दुखदर्द की पैरवी करने वाला कोई जुझारू नेता देश की सर्वोच्च अदालत/संसद में बैठा हुआ है।

शिबन कृष्ण रैणा 

Monday, December 3, 2018



डॉ0 शिबन कृष्ण रैणा (२२ अप्रैल,१९४२) 

परिचय

कई पुरस्कारों एवं सम्मानों से समादृत डॉ०रैणा वर्ष १९९९ से लेकर २००१ तक भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान,शिमला में अध्येता रहे हैं जहाँ उन्होंने भारतीय भाषाओँ से हिंदी में अनुवाद की समस्याओं पर कार्य किया है. यह कार्य संस्थान से प्रकाशित हो चुका है.चौदह पुस्तकों और सौ से भी अधिक लेखों/शोधपत्रों के लेखक डॉ०रैणा देश की कई साहित्यिक/सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं.राजस्थान साहित्य अकादमी का पहला ‘अनुवाद-पुरस्कार’ प्राप्त करने का श्रेय डॉ०रैणा को है.इनकी पुस्तकें भारतीय ज्ञानपीठ,राजपाल एंड संस, साहित्य अकेडमी,हिन्दी बुक सेंटर,जे०एंड०के० कल्चरल अकादमी,भुवनवाणी ट्रस्ट आदि प्रकाशकों से प्रकाशित हो चुकी हैं. कश्मीरी रामायण “रामावतारचरित” का सानुवाद देवनागरी में लिप्यंतर करने का श्रेय डॉ०रैणा को है. इस श्रमसाध्य कार्य के लिए बिहार राजभाषा विभाग ने इन्हें ताम्रपत्र से विभूषित किया है.

कश्मीर विश्वविद्यालय से १९६२ में हिंदी में एम०ए०(प्रथम श्रेणी में प्रथम रहकर)तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से यूजीसी की फ़ेलोशिप पर पी-एच०डी कर लेने के बाद १९६६ में डॉ०रैणा का राजस्थान लोकसेवा आयोग,अजमेर से हिंदी व्याख्याता पद पर चयन हुआ था. कालान्तर में हिंदी-विभागाध्यक्ष,उप-प्राचार्य/प्राचार्यआदि पदों पर पदोन्नत हुए.राजस्थान विश्वविद्यलय से इन्होंने एम०ए०(अंग्रेजी) की उपाधि भी प्राप्त की है। डॉ०रैणा संस्कृति मंत्रालय(भारतसरकार) के सीनियर फेलो (हिंदी) भी रहे हैं. केन्द्रीय हिंदी निदेशालय (मानव संसाधन विकास मंत्रलय) की हिंदी-अनुदान और पुरस्कार समितियों के भी डॉ0 रैणा विशेष-सदस्य मनोनीत किये गये।

डॉ०रैणा को २०१५ में भारत सरकार द्वारा “विधि और न्याय मंत्रालय” की हिंदी सलाहकार समिति” का गैर-सरकारी सदस्य नामित किया गया है.



Friday, November 9, 2018


मीडिया की साख 

मीडिया जनतंत्र का चौथा पाया माना जाता है।सही को गलत और गलत को सही कहना उसका धर्म नहीं है।उसका नैतिक धर्म है सही को सही और गलत को गलत कहना। मगर वास्तविकता यह है कि मीडिया से जुड़ा हर माध्यम किसी-न-किसी तरीके से अपनी प्रतिबद्धताओं/पूर्वग्रहों से ग्रस्त रहता है। इसीलिए पक्ष कमज़ोर होते हुए भी बड़ी चालाकी से डिबेट या खबर का रुख अपने मालिकों के पक्ष में मोड़ने में पेश-पेश रहते हैं।खबर रूपी समोसे को आप दोने-पत्तल में भी परोसकर पेश कर सकते हैं और चांदी की प्लेट में भी।प्रश्न यह है कि मीडिया का मन रमता किस में है?

समाचारों की तथ्यपरकता पर जब सम्पादक-एंकर अथवा मालिक की अपनी प्रतिबद्धताएं और आत्मपरकता हावी हो जाती है तो मूल समाचार के प्रयोजन/प्राथमिकता अथवा उसकी असलियत का दब जाना स्वाभाविक है। दर्शकों को विना किसी पूर्वग्रह के साफ-सुथरी,बेलाग और निष्पक्ष जानकारियां चाहियें,एक-पक्षीय या भेदभाव जनित खबरें नहीं ।

एक खबर मीडिया में आई थी कि मुम्बई में एक मुस्लिम कामकाजी महिला को किराये पर मकान नहीं मिल सका और यह मामला मीडिया में खूब उछला।यह सही है कि जाति अथवा मज़हब के आधार पर मकान को किराये पर देने या न देने की संकीर्ण मानसिकता की पुरज़ोर शब्दों में निंदा की जानी चाहिए।मगर यह भी सही है कि प्रायः हमारा मीडिया तथ्यों को एकांगी दृष्टि से देखता है।एक चैनल ने यह भी दिखाया कि मुम्बई में ही कैसे मुस्लिम-बहुल बस्ती या मुहल्ले में एक हिन्दू को मकान किराये पर नहीं मिलता है।अगर पहली बात अनुचित है तो दूसरी बात भी कोई उचित नहीं है।मगर मीडिया दूसरी बात को सामने लाने में जाने क्यों जानबूझकर पीछे रहता है या रहना चाहता है?हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस तरह के एकांगी,संवेदनशील और एकपक्षीय मुद्दे/समाचार उछालने से देश में सौहार्द कम और बदमज़गी ज़्यादा पैदा होती है।

कभी-कभी मीडिया के दोगले आचरण पर भी दया आती है । मन-माफिक दल की खूब प्रशंसा करेंगे और विचार के स्तर पर जिससे मतभेद है,ऐसी पार्टी को लानत भेजेंगे। मगर पार्टी-प्रचार के लाखों/करोड़ों के विज्ञपनों को छापने/दिखाने में तनिक भी नाक-भौंह नहीं सिकोड़ेंगे ।विडंबना देखिये योगगुरु रामदेव को अव्वल दर्जे का पूंजीवादी/बाजारवादी मानसिकता का व्यक्ति बतायेंगे मगर उसके लाखों के विज्ञापनों को लेने से इनकार नहीं करेंगे बल्कि दिल खोलकर प्रसारित/प्रकाशित करेंगे ।

शिबन कृष्ण रैणा 

अलवर