Tuesday, June 21, 2016





दुबई में प्रभु श्रीनाथजी

९६७ से लेकर १९७७ तक मैं प्रभु श्रीनाथजी की नगरी नाथद्वारा में सेवारत रहा. एक तरह से मेरे अकादमिक और गृहस्थ जीवन की शरुआत इसी पावन नगरी से हुयी. स्मृति-पटल पर इस जगह की बहुत-सारी सुखद स्मृतियाँ अभी तक अंकित हैं. इधर, गृहस्थी बढ़ती-फैलती गयी और पिछले तीस-पैंतीस वर्षों के दौरान जिंदगी के सारे उतर-चढ़ावों और खट्टे-मीठे अनुभवों को पीछे मुड़कर देखना अब बहुत अच्छा लगता है. दो बेटियों की शादियाँ हो चुकी हैं. दोनों के पति सेना में उच्च ओहदों पर हैं. बेटा कुछेक वर्षों तक तो स्वदेश में रहा और बाद में वह दुबई चला गया किसी बड़ी कंपनी में.

मैं जब भी दुबई आता हूँ तो दुबई में बने प्रभु श्रीनाथजी के मंदिर के दर्शन करना नहीं भूलता. बेटा भी चूँकि नाथद्वारा के ‘जागृत-बाल-मन्दिर’ में पहली-दूसरी क्लास में पढ़ा है, अतः मुझे दुबई स्थित श्रीनाथजी के मंदिर ले जाने में ज़रा भी आलस्य नहीं करता. अजमान(जहाँ पर बेटा रहता है) से लगभग एक-डेढ़ घंटे की दूरी पर स्थित यह मंदिर-परिसर देखने लायक है. सर्वधर्म सद्भाव की सुंदर झलक मिलती है यहाँ. सिखों का गुरुद्वारा, शिरडी के सांई का मंदिर, शिवजी का मंदिर, प्रभु श्रीनाथजी का मंदिर आदि सबकुछ एक ही जगह पर. एक मस्जिद भी बगल में है.
इस बार कुछ ऐसा योग बना कि दुबई स्थित श्रीनाथजी के मंदिर के स्थानीय मुखियाजी से भेंट हो गयी. जब उन्हें यह मालूम पड़ा कि मैं नाथद्वारा में रहा हूँ और वहां कॉलेज में मैं ने पढ़ाया है तो पूछिये मत. सत्तर के दशक की नाथद्वारा नगर की सारी बातें और घटनाएँ दोनों की आँखों के सामने उभर कर आ गयीं. मनोहर कोठारीजी, गिरिजा व्यास, नवनीत पालीवाल, दशोराजी, भंवरलाल शर्मा, बहुगुणा साहब, ललितशंकर शर्मा, मधुबाला शर्मा, बाबुल बहनजी, कमला मुखिया, भगवतीलाल देवपुराजी आदि जाने कितने-कितने परिचित नाम हमारे वार्तालाप के दौरान हम दोनों को याद आये.
हालांकि वे सीधे-सीधे मेरे विद्यार्थी कभी नहीं रहे क्योंकि जब मैं कॉलेज में था तो वे आठवीं कक्षा में पढ़ते थे. मगर जैसे ही उन्हें ज्ञात हुआ कि नाथद्वारा मंदिर के वर्तमान मुखियाजी श्री इंद्रवदन मेरे विद्यार्थी रहे हैं तो वे सचमुच विह्वल हो उठे. गदगद इतने हुए कि मुझे अपना गुरु समझने लगे यानी गुरु के गुरु! स्पेशल प्रसाद मंगवाया और मुझे भेंट किया.



Monday, June 20, 2016



ईश्वर का कार्य 

(‘व्हाट्सअप्प’ पर कभी-कभी पढने लायक सामग्री आती है।शिक्षाप्रद भी और मनोरंजन करने वाली भी।ऊपर से लिखा होता है कि पसंद आ जाये तो शेयर अवश्य करें।पसंद आयी है,तभी शेयर कर रहा हूँ।) 


एक बार श्री कृष्ण और अर्जुन भ्रमण पर निकले तो उन्होंने मार्ग में एक निर्धन ब्राहमण को भिक्षा मांगते देखा.अर्जुन को उस पर दया आ गयी और उन्होंने उस ब्राहमण को स्वर्ण मुद्राओं से भरी एक पोटली दे दी जिसे पाकर ब्राहमण प्रसन्नता-पूर्वक अपने सुखद भविष्य के सुन्दर स्वप्न देखता/बनाता घर लौट चला।किन्तु उसका दुर्भाग्य उसके साथ चल रहा था। राह में एक लुटेरे ने उससे वो पोटली छीन ली।ब्राहमण दुखी होकर फिर से भिक्षावृत्ति में लग गया।अगले दिन फिर अर्जुन की दृष्टि जब उस ब्राहमण पर पड़ी तो उन्होंने उससे इसका कारण पूछा।ब्राहमण ने सारा विवरण अर्जुन को बता दिया।ब्राहमण की व्यथा सुनकर अर्जुन को फिर से उस पर दया आ गयी और इस बार उन्होंने ब्राहमण को एक मूल्यवान माणिक दे दिया।ब्राहमण उसे लेकर घर पंहुचा।उसके घर में एक पुराना घड़ा था जो बहुत समय से प्रयोग में नहीं आ रहा था।ब्राह्मण ने चोरी होने के भय से माणिक उस घड़े में छुपा दिया।मगर यहाँ पर भी उसके दुर्भाग्य ने उसका पीछा नहीं छोड़ा।दिन भर का थका मांदा होने के कारण उसे नींद आ गयी। इस बीच ब्राहमण की स्त्री नदी में जल लेने चली गयी किन्तु मार्ग में ही उसका घड़ा टूट गया। ‘उसने सोचा, घर में जो पुराना घड़ा पड़ा है उसे ले आती हूँ’, ऐसा विचार कर वह घर लौटी और उस पुराने घड़े को ले कर चली आई और जैसे ही उसने घड़े को नदी में डुबोया वह माणिक भी जल की धारा के साथ बह गया।ब्राहमण को जब यह बात पता चली तो अपने भाग्य को कोसता हुआ वह फिर भिक्षावृत्ति में लग गया।अर्जुन और श्री कृष्ण ने जब फिर उसे इस दरिद्र अवस्था में देखा तो उसका कारण पूछा।सारा वृतांत सुनकर अर्जुन को बड़ी हताशा हुई और मन ही मन सोचने लगे इस अभागे ब्राहमण के जीवन में कभी सुख नहीं आ सकता।

अब यहाँ से प्रभु की लीला प्रारंभ हुई।उन्होंने उस ब्राहमण को दो पैसे दान में दे दिए। अर्जुन ने उनसे पूछा “प्रभु!जब मेरी दी मुद्राएँ और माणिक भी इस अभागे की दरिद्रता मिटा नहीं सके, तो इन दो पैसों से इसका क्या होगा भला?” ? यह सुनकर प्रभु बस मुस्कुरा-भर दिए और अर्जुन से उस ब्राहमण के पीछे जाने को कहा।रास्ते में ब्राहमण सोचता हुआ जा रहा था कि "इन दो पैसो से तो एक व्यक्ति के लिए भी भोजन नहीं आएगा ।प्रभु ने उसे इतना तुच्छ दान क्यों दिया ? प्रभु की यह कैसी लीला है "? ऐसा विचार करता हुआ वह चला जा रहा था।तभी उसकी दृष्टि एक मछुआरे पर पड़ी। उसने देखा कि मछुआरे के जाल में एक मछली फँसी है और वह छूटने के लिए तड़प रही है ।ब्राहमण को उस मछली पर दया आ गयी। उसने सोचा "इन दो पैसो से पेट की आग तो बुझेगी नहीं।क्यों न इस मछली के प्राण ही बचा लिए जायें?”यह सोचकर उसने दो पैसो में उस मछली का सौदा कर लिया और मछली को अपने कमंडल में डाल लिया। कमंडल में जल भरा और मछली को नदी में छोड़ने चल पड़ा।तभी मछली के मुख से कुछ निकला। उस निर्धन ब्राह्मण ने देखा कि यह वही माणिक था जो उसने घड़े में छुपाया था।ब्राहमण प्रसन्नता के मारे चिल्लाने लगा “मिल गया, मिल गया ”..!!!तभी भाग्यवश वह लुटेरा भी वहाँ से गुजर रहा था जिसने ब्राहमण की मुद्राएँ लूटी थी।उसने ब्राह्मण को चिल्लाते हुए सुना “ मिल गया” “मिल गया”।लुटेरा भयभीत हो गया। उसने सोचा कि ब्राहमण उसे पहचान गया है और इसीलिए चिल्ला रहा है। अब अगर इसने राजदरबार में मेरी शिकायत कर दी तो मेरी खैर नहीं। डरकर वह ब्राहमण से रोते हुए क्षमा मांगने लगा और उससे लूटी हुई सारी मुद्राएँ उसे वापस कर दीं।यह देख अर्जुन प्रभु के आगे नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सके।अर्जुन बोले,’प्रभु यह कैसी लीला है?’ जो कार्य थेली-भर स्वर्ण मुद्राएँ और मूल्यवान माणिक नहीं कर सके वह आपके दो पैसो ने कर दिखाया।श्री कृष्णा ने कहा “अर्जुन यह अपनी-अपनी सोच का अंतर है। जब तुमने उस निर्धन को थैली भर स्वर्ण मुद्राएँ और मूल्यवान माणिक दिए तब उसने मात्र अपने सुख के विषय में सोचा। किन्तु जब मैने उसको दो पैसे दिए। तब उसने दूसरे के दुःख के विषय में सोचा। इसलिए हे अर्जुन-सत्य तो यह है कि, जब आप दूसरो के दुःख के विषय में सोंचते हैं, जब आप दूसरे का भला कर रहे होते हैं, तब आप ईश्वर का कार्य कर रहे होते हैं और तब ईश्वर भी आपके साथ होते हैं।“


विश्व के दो महत्वपूर्ण पत्र.

विश्व में जो दो सबसे सुप्रसिद्ध और आदर्श पत्र माने गए है, उनमें एक है 'घनश्यामदास बिरला का पुत्र के नाम पत्र' और दूसरा है 'अब्राहम लिंकन का शिक्षक के नाम पत्र' l

(घनश्यामदास जी बिड़ला का अपने पुत्र बसंत कुमार जी बिड़ला के नाम 1934 में लिखित एक अत्यंत प्रेरक पत्र जो हर एक को जरूर पढ़ना चाहिए).

चि.वसंत,
यह जो लिखता हूँ उसे बड़े होकर और बूढ़े होकर भी पढ़ना, अपने अनुभव की बात कहता हूँ। संसार में मनुष्य जन्म दुर्लभ है और मनुष्य जन्म पाकर जिसने शरीर का दुरुपयोग किया, वह पशु है। तुम्हारे पास धन है, तन्दुरुस्ती है, अच्छे साधन हैं, उनको सेवा के लिए उपयोग किया, तब तो साधन सफल है अन्यथा वे शैतान के औजार हैं। तुम इन बातों को ध्यान में रखना।

धन का मौज-शौक में कभी उपयोग न करना, ऐसा नहीं कि धन सदा रहेगा ही, इसलिए जितने दिन पास में है उसका उपयोग सेवा के लिए करो, अपने ऊपर कम से कम खर्च करो, बाकी जनकल्याण और दुखियों का दुख दूर करने में व्यय करो। धन शक्ति है, इस शक्ति के नशे में किसी के साथ अन्याय हो जाना संभव है, इसका ध्यान रखो की अपने धन के उपयोग से किसी पर अन्याय ना हो। अपनी संतान के लिए भी यही उपदेश छोड़कर जाओ। यदि बच्चे मौज-शौक, ऐश-आराम वाले होंगे तो पाप करेंगे और हमारे व्यापार को चौपट करेंगे। ऐसे नालायकों को धन कभी न देना, उनके हाथ में जाये उससे पहले ही जनकल्याण के किसी काम में लगा देना या गरीबों में बाँट देना। तुम उसे अपने मन के अंधेपन से संतान के मोह में स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं कर सकते। हम भाइयों ने अपार मेहनत से व्यापार को बढ़ाया है तो यह समझकर कि वे लोग धन का सदुपयोग करेंगे l

भगवान को कभी न भूलना, वह अच्छी बुद्धि देता है, इन्द्रियों पर काबू रखना, वरना यह तुम्हें डुबो देगी। नित्य नियम से व्यायाम-योग करना। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी सम्पदा है। स्वास्थ्य से कार्य में कुशलता आती है, कुशलता से कार्यसिद्धि और कार्यसिद्धि से समृद्धि आती है l सुख-समृद्धि के लिए स्वास्थ्य ही पहली शर्त है l मैंने देखा है की स्वास्थ्य सम्पदा से रहित होनेपर करोड़ों-अरबों के स्वामी भी कैसे दीन-हीन बनकर रह जाते हैं। स्वास्थ्य के अभाव में सुख-साधनों का कोई मूल्य नहीं। इस सम्पदा की रक्षा हर उपाय से करना। भोजन को दवा समझकर खाना। स्वाद के वश होकर खाते मत रहना। जीने के लिए खाना हैं, न कि खाने के लिए जीना हैं।

घनश्यामदास बिड़ला

दूसरा पत्र 

(अब्राहम लिंकन ने यह पत्र अपने बेटे के स्कूल प्रिंसिपल को लिखा था। लिंकन ने इसमें वे तमाम बातें लिखी थीं जो वे अपने बेटे को सिखाना चाहते थे। ये बातें सिर्फ किसी एक स्टूडेंट के लिए ही महत्वपूर्ण क्यों हो, सभी के लिए क्यों नहीं।) 

सम्माननीय सर...


मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नहीं हैं। यह बात मेरे बेटे को भी सीखना होगी। पर मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह बताएँ कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है। हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है। मैं चाहता हूँ कि आप उसे सिखाएँ कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है। ये बातें सीखने में उसे समय लगेगा, मैं जानता हूँ। पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया गया एक रुपया, सड़क पर मिलने वाले पाँच रुपए के नोट से ज्यादा कीमती होता है। आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाएँ। साथ ही यह भी कि खुलकर हँसते हुए भी शालीनता बरतना कितना जरूरी है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएँगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्‍छी बात नहीं है। यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए।
आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, पर साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को धूप, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मँडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा। मैं समझता हूँ कि ये बातें उसके लिए ज्यादा काम की हैं।
मैं मानता हूँ कि स्कूल के दिनों में ही उसे यह बात भी सीखना होगी कि नकल करके पास होने से फेल होना अच्‍छा है। किसी बात पर चाहे दूसरे उसे गलत कहें, पर अपनी सच्ची बात पर कायम रहने का हुनर उसमें होना चाहिए। दयालु लोगों के साथ नम्रता से पेश आना और बुरे लोगों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए। दूसरों की सारी बातें सुनने के बाद उसमें से काम की चीजों का चुनाव उसे इन्हीं दिनों में सीखना होगा।
आप उसे बताना मत भूलिएगा कि उदासी को किस तरह प्रसन्नता में बदला जा सकता है। और उसे यह भी बताइएगा कि जब कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल ना करे। मेरा सोचना है कि उसे खुद पर विश्वास होना चाहिए और दूसरों पर भी। तभी तो वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा।


ये बातें बड़ी हैं और लंबी भी। पर आप इनमें से जितना भी उसे बता पाएँ उतना उसके लिए अच्छा होगा। फिर अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है और बहुत प्यारा भी।

आपका
अब्राहम लिंकन

मैं कवि नहीं हूं : कश्मीर का दर्द उकेरती कविताएं

मार्मिक कविताओं का खूबसूरत संकलन


डॉ० शिबन कृष्ण रैणा

कश्मीर में आतंकवाद के दंश ने कश्मीरी जनमानस को जो पीड़ा पहुंचाई है,उससे उपजी ह्रदय-विदारक वेदना तथा उसकी व्यथा-कथा को साहित्य में ढालने के सफल प्रयास पिछले लगभग दो दशकों के बीच हुए हैं।

कई कविता-संग्रह, कहानी-संकलन,औपन्यासिक कृतियां आदि सामने आए हैं, जो कश्मीर में हुई आतंकी बर्बरता और उससे जनित एक विशेष जन-समुदाय के ‘विस्थापन’ की विवशताओं को बड़े ही मर्मस्पर्शी अंदाज में व्याख्यायित करते हैं। इस सन्दर्भ में कश्मीर के चर्चित कवि ब्रजनाथ ‘बेताब’ के कविता-संग्रह ‘मैं कवि नहीं हूं...’ का उल्लेख करना परम आवश्यक है। अपनी विशिष्ट रचना-शैली,भावाभिव्यक्ति तथा विषय-वस्तु की दृष्टि से यह संग्रह न केवल पठनीय बन पड़ा है अपितु मन-मस्तिष्क को उद्वेलित करने वाला एक सुचिन्त्य एवं संग्रहणीय दस्तावेज भी बन पड़ा है। ‘माइग्रेण्ट कल्चर’ को केन्द्र में रखकर कवि ने जो बिम्ब और रूपक इस संग्रह की कविताओं में उकेरे हैं, वे मर्म को छूने वाले तो हैं ही, ‘विस्थापन’ की पीडा और त्रासदी से जनित कवि के मन की आकुलता एवं आक्रोश को बडी कलात्मकता के साथ रूपायित भी करते हैं। भोगी हुई पीडा के प्रतिक्रियास्वरूप ‘बेताब’ की स्थितियों को समझने-देखने की क्षमता उनकी अद्भुत प्रतिभा/मनस्विता का परिचय देती है। ‘माइग्रेण्ट कल्चर’ की परिभाषा कवि ने इन शब्दों में की है-

‘माइग्रेण्ट कल्चर'
जिसमें न भूत है, न भविष्य, न वर्तमान,
और जहां न भूत, न भविष्य, न वर्तमान हो,
वहां कविता हो ही नहीं सकती...। पृ.6

‘बेताब’ का चिंतन विस्थापन की त्रासदी को समूचे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में आंकता-परखता है। कवि की पीड़ा का स्वर इतिहास के पन्नों को खंगालते हुए बडे ही तीखे और आक्रोश-भरे अंदाज में यों कटाक्ष करता है-

मेरी कविता मुख्यमंत्री का वह पद है
जिसपर एक पिता अपने पुत्र की अपने
स्वर्गवासी पिता की तरह ताजपोशी कराकर
उसे सिंहासन पर विराजमान करता है....।पृ.11

भावस्थितियों की विविधता ‘बेताब’ की कविताओं में विपुल मात्रा में देखने को मिलती है। कहीं बेबसी है तो कहीं कर्मोत्साह है। कहीं दैन्य है तो कहीं आक्रोश है। कहीं चीख है तो कहीं मूक संगीत है।कुल मिलाकर कवि की हृदय-तन्त्री से निकले हुए हर भाव का समायोजन संगह की कविताओं में बडी कुशलता और सटीकता से हुआ है। एक स्थान पर कवि कहता है-

पहले संगीत बजता था तो दिल के तार भी बजते थे
अब दिलों के बीच तार लगा दी गई है
और संगीत चीखता है....।
अब हर कोई चीखता है और
मेरे देशवासियों की चीखें शिखर पर बैठे
कवि के कानों तक नहीं पहुंच पातीं....।पृ.19

प्रायः समझा जाता है कि कवि कल्पनाशील होता है और भविष्य के सुनहरे आदर्शवादी ताने-बाने बुनने में उसकी अधिक दिलचस्पी रहती है।मगर, ‘बेताब’ की कविताएं ऐसा कुछ भी संकेत नहीं देतीं। वे ठोस यथार्थ और भोगे हुए कड़वे सत्य को भावाकुलता के साथ उद्घाटित करने वाली जीवन्त शब्द-रचनाएं हैं-

मैं कवि नहीं हूं
न भविष्य मेरी कविता है
मेरी कविता वर्तमान है
जिसमें चौराहे पर जलता हुआ एक दिया
जलकर राह चलते लोगों को
राह दिखाता है।.....पृ.25-26

विरोधाभासी शैली का इस्तेमाल करना ‘बेताब’ की कविताओं की खास पहचान है मनोभावों को व्यंग्य के नुकीले बाणों ;कैक्टस के नुकीले कांटों की तरह पाठक के अन्तर्मन को छूते हुए उसके मस्तिष्क में एक कौंध जगाना यों एक सरल कार्य तो नहीं है, मगर ‘बेताब’ की कविताओं में यह ‘क्वॉलिटी’ खूब देखने को मिलती है। वह पाठक को झिंझोडती ही नहीं, उसे बहुत-कुछ सोचने पर भी मजबूर करती है-

मैं कवि नहीं हूं
न मूल्यों का वर्णन मेरी कविता है,
मूल्यों का वर्णन करने वाला
विधायक,मंत्री,नेता हो जाता है,
और विधायक,मंत्री,नेता
कविता नहीं,उपदेश देते हैं
अपने स्वार्थ रूपी महाभारत के युद्ध में,और
बना देते हैं कुरुक्षे़त्र
समस्त देश को।...पृ.33

विस्थापन की त्रासदी ने कवि के मन-मस्तिष्क को बहुत गहरे तक आक्रांत कर दिया है। उसकी यह पीड़ा उसके रोम-रोम में समाई हुई है। घर-परिवार की सुखद स्मृतियों से लेकर आतंकवाद की आग तक की सारी क्रूर स्थितियां कवि की एक-एक पंक्ति में उभर-उभर कर सामने आती हैं। आतंकी विभीषिकाओं का कवि द्वारा किया गया वर्णन और उससे पैदा हुई सामाजिक असमानता/स्थितियां मन को यों आहत करती हैं-

मैं कवि नहीं हूं
न मेरी धरा के सीने में छिपा मेरा लहू
मेरी कविता है।
क्योंकि मैं अपने लहू को छिपाने का नहीं
लहू से धरा को सींचने का आदी रहा हूं।
यही मेरी विरासत,मेरी परंपरा है
जिसे निभाते निभाते मैं
बहुसंख्यक होते हुए भी अल्पसंख्यक हो गया हूं।...पृ.42

एक अन्य स्थान पर कवि द्वारा किए गया ‘कर्फ्यू’ का वर्णन कैसा मर्मांतक बन पड़ा है,यह देखिए-

मेरी कविता कर्फ्यू से उत्पन्न वह सन्नाटा है
जिसमें एक बच्चे के बिलखने की आवाज
किसी भी कान तक नहीं पहुंचती...
और जब बच्चा रोता है
तो मां उसे यह कह कर दबोच लेती है-
बेटा चुप हो जा, नहीं तो मुखबिर आएगा
और जहां मुखबिर के डर से
भूख की मार सहनी पड़े
वहां कविता हो ही नहीं सकती।...पृ. 45-46

कुल मिलाकर ब्रजनाथ ‘बेताब’ के कविता-संग्रह ‘मैं कवि नहीं हूं...’ में संकलित कविताएं कवि के मन से निकले ऐसे उद्गार हैं जो उनके भोगे हुए यथार्थ से साक्षात्कार कराते हैं और इसके लिए वे परिस्थितियों को नहीं अपितु अपने पुरखों को दोषी ठहराते हैं और मोटे तौर पर सम्भवतः इस संकलन की सार्थकता भी इसी बात को रेखांकित करने में है-

मेरी कविता
मेरे पुरखों का वह ‘पाप’ है
जिसकी सजा मैं
इस ‘कारागार’ में काट रहा हूं।....पृ.50

उनके वे शब्द आज तक मुझे याद हैं! 


बात १९६३-६४ की होनी चाहिए।तब मैं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यलय से यू०जी० सी० की फ़ेलोशिप पर पी-एच डी० कर रहा था।हिंदी विभाग के अध्यक्ष आचार्य विनयमोहन शर्मा हुआ करते थे।उन्होंने जाने क्या सोचकर मुझे हिंदी विभाग की “अनुसन्धान परिषद” का सचिव मनोनीत किया था। परिषद का उद्घाटन आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदीजी से करवाना निश्चित हुआ।आचार्यजी उस ज़माने में पंजाब विश्विद्यालय,चंडीगढ़ के हिंदी-विभागाध्यक्ष हुआ करते थे।परिषद का उद्घाटन हो जाने के बाद कुछ समय के अनंतर यह तय किया गया कि दिल्ली से अज्ञेयजी को भाषण देने के लिए बुलाया जाय। तब शायद अज्ञेय ‘दिनमान’ के सम्पादक हुआ करते थे।“अनुसन्धान परिषद” के लैटर हेड पर उनको मैं ने भाषण देने के लिए बाकायदा आमन्त्रण-पत्र भेजा।उनका उत्तर भी तुरंत आगया। पत्र में उन्होंने आने की स्वीकृति तो दे दी मगर अपने नाम के शब्द ‘वात्स्यायन’ की गलत टाइपिंग पर नाराज़गी जताई। आचार्यजी (विनयमोहनजी) को जब इस बात का पता चला तो वे मुझपर तनिक नाराज़ हुए। --खैर,कार्यक्रम हो गया।चायपानी के दौरान अज्ञेयजी मेरे निकट आगये और मेरा मनोबल यह कहकर बढ़ाया: “तुम कोई अपवाद नहीं हो, मेरे नाम का अधूरा और गलत उच्चारण बड़े-बड़े विद्वान/प्रोफेसर करते हैं।तुम तो अभी महज़ एक शोधछात्र हो।” उनके ये शब्द आज तक मुझे याद हैं।
यह उस समय की बात है जब कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आचार्य विनयमोहनजी के अतिरिक्त सर्वश्री पद्मसिंह शर्मा कमलेश,जयनाथ नलिन,छविनाथ त्रिपाठी,शशिभूषण सिंहल,हरिश्चंद्र वर्मा,जयभगवान गोयल,मनमोहन सहगल,ब्रह्मांदजी आदि कार्यरत थे।हुकुमचंद राजपाल,बैजनाथ सिंहल,राजकुमार शर्मा,सुधींद्र कुमार,जवाहरलाल हांडू,ललिता हांडू,ब्रजमोहन शर्मा,कृष्णा शर्मा,कांता सूद आदि शोधछात्र/आनर्स के विद्यार्थी हुआ करते थे।

विस्थापित पंडितों से संबंधित प्रश्नों का हल 


कश्मीर और कश्मीर के विस्थापित पंडितों से संबंधित प्रश्नों का हल ढूँढने के लिए अचानक कुछ सरगर्मी-सी आ गयी है। पहले श्रीश्री ने पिछली शुक्रवार की शाम को हुर्रियत के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक से उनके आवास पर मुलाकात कर कश्मीर में चल रही स्थितिपर विस्तार से चर्चा की। बाद में दर्जन-भर स्वघोषित पंडित नेताओं ने भी मीरवाइज से मुलाकात की और पंडितों की घाटी में वापसी औरउनके पुनर्वास पर विचार-विमर्श किया। तनाव-ग्रस्त घाटी में शांति स्थापित हो और पंडित समुदाय ससम्मान घाटी में लौटे,उसके लिएकिये जाने वाले ऐसे प्रयासों की हर स्तर पर प्रशंसा की जानी चाहिय। लेकिन चिंता का विषय थोड़ा अलग है। ऐसी महत्वपूर्ण वार्ताओं केलिए हमेशा मान्यता-प्राप्त मंचों के माध्यम से ही बातचीत की पहल की जानी चाहिए । छोटे गुट नेतृत्व में केवल विभाजन पैदा करते हैं।मुझे ध्यान है ‘पनुन कश्मीर’ पंडितों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था हुआ करती थी।पिछले लगभग पच्चीस वर्षों के दौरान इस संस्था ने हरमुश्किल घड़ी में पंडितों का साथ दिया है और धरने-प्रदर्शनों के आलावा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरी पंडितों के मुद्दे कोज़ोरदार तरीके से उठाया है और जिंदा रखा है। समझ में नहीं आ रहा कि क्या ‘पनुन कश्मीर’ के नेताओं को हाशिए पर डाल दिया गया हैया फिर ‘पनुन कश्मीर’ के नेताओं ने अपनी मर्ज़ी से इन स्वयंभू पंडित नेताओं को अपना कार्यभार सौंप दिया है? कौन नहीं जानता किबहुत-सारे नेता या मंच ज्यादातर मामले को सुलझाने के बजाय उसे उलझाते ही हैं।
खबर यह भी है कि अपनी मुलाक़ात के दौरान श्रीश्री मीरवाइज़ की कश्मीर के लिए आज़ादी की बातें और दूसरी शिकायतें सुनते रहे मगर कश्मीर में पंडितों को वादी में बसाने के प्रस्ताव के पक्ष में अपना कोई ठोस अभिमत सामने नहीं रखा। प्रश्न उठता है कि श्रीश्री ऐसेव्यक्ति से मिले ही क्यों जिसका चिन्तन देश-विरोधी है, जो अलगाववादियों का पक्षधर है और जो हमेशा यह कहता रहा है कि कश्मीर काभारत के साथ विलय विवादास्पद है। देश-विरोधी सोच रखने वाले व्यक्ति से श्रीश्री का मिलना उन्हें प्रश्नों के दायरे में लाकर खड़ा करताहै। जो शख्स कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानता और जिसका चिंतन हमेशा से देश-विरोधी रहा हो,उसके यहाँ क्यों हमारे सन्त-महात्मा या नेतागण मिलने जाते हैं?क्या मीरवाइज मान गए कि कश्मीर भारत का अटूट हिस्सा है और उन्हें अब अपने कहे परपछतावा है?कुछ तो है जिसकी वजह से हमारी सरकारें या फिर हमारे प्रबुद्ध नेतागण और चिंतक अलगाववादियों को बुरा नहीं कह रहेऔर न ही उनके व्यवहार को अन्यथा ले रहे हैं।

Sunday, June 19, 2016


डीडीए नेशनल पर मेरा साक्षात्कार 


डीडीए नेशनल पर २०१२ में मेरा एक साक्षात्कार प्रसारित हुआ.लगभग आध घंटे के इस साक्षात्कार में मेरे साहित्यिक अवदान को केंद्र में रखकर सुन्दर चर्चा हुयी.जिसने भी देखा मुझे बधाई भेजी.